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Wednesday, April 3, 2013

वादें और इरादे (राजनेता और आम आदमी के बीच की वार्तालाप)


राजनेता: देश को आगे बढ़ाएंगे, ग़रीबी और बीमारी हटाएंगे,
               खूब फलेगा देश में व्यापार, बस बना दो हमारी सरकार|
                देश हमारा अच्छा है, बस अक्ल से थोड़ा कच्चा है,
                हम करेंगे इस देश को तैयार, बस बना दो हमारी सरकार|

आदमी
: देश तो आगे बढ़ रहा है, पर बर्बादी की राह पे,
              फैल रही है भ्रष्टाचार की बीमारी हमसे इस संसार में|
              खराब हो रहा हैं इस देश का नाम, क्या करेंगे बना कर सरकार|

राजनेता
: हम नयी रोज़गार योजना बनाएंगे,
               जो कहे हमे पिछड़ा, उसे हम अपनी मिसाइले दिखाएंगे|
               बिछा देंगे हम पानी बिजली का जाल,
               बस बन जाने दो हमारी सरकार|

आदमी
: रोज़गार योजना बहुत बनाते हो,
             पर उसमे अपने रिश्तेदारो को ही दाखिला दिलाते हो|
             अंधेरे में जी रहा हैं देश के किसान,
             कब से प्यासा हैं देश का जवान,
             क्या करोगे बना के सरकार|

राजनेता
: देश में फैली शांति होगी,
                उन्नति की नयी क्रांति होगी,
                बढ़ा देंगे हम सुरक्षा का जाल,
                ऐसी होगी हमारी सरकार|


आदमी
: शांति का पाठ तुम पढ़ाते,
              राम रहीम को तुम लड़वाते,
              देश की सुरक्षा का है बुरा हाल,
              क्या कर लेगी तुम्हारी सरकार|

राजनेता: हमारी सरकार अलग होगी, हम देश को आगे ले जाएंगे,
                सारे देशवासियों को सफलता की नयी राह दिखाएंगे,
                उँचाई की चोटी पर होगा ये देश महान,
                बस बन जाने दो हमारी सरकार|

आदमी
: सब अलग हैं इसी बात का तो गम हैं,
              कोई ना समझे इस बात को की एकता में ही दम हैं,
              उँचाईया तो बहुत दूर हैं, देश का आम आदमी मजबूर हैं,
              बता दे मुझे ओ देश के नेता, इसमे मेरा क्या कसूर हैं?

राजनेता
: कसूरवार कोई नही, ये पड़ोसी मुल्क की साजिश हैं,
               जलते हैं सब हमसे, ये वक़्त की फरमाइश हैं|

आदमी
: महँगाई से देश जल रहा हैं,
             सफलता का सूरज, इसीलिए ढल रहा हैं,
             अरे यार तू छोड़ इन सबको, कर इन बातों का ध्यान,
             कौन रहा कितना पीछे इसपर क्‍यों हैं तेरा ध्यान,
             तेरी स्पर्धा खुद से हैं, तू स्थापित कर नयी प्रतिमान|
             अपने विगत प्रतिमानो के प्रति स्पर्धा जो मन में जागे,
              बढ़ उठते हैं नये कदम अपने ही कदमो के आगे|

राजनेता: विगत प्रतिमानो से ही चल रहा हैं ये देश,
                पुराने आदर्श ही हैं हमारे नरेश,
                देश की हालत के तुम भी ज़िम्मेदार हो,
               ये तुम्हारा भी देश हैं, फिर तुम क्यों ना तैयार हो|

आदमी
: बाग के बाग को बीमार बना देती हैं,
              भूखे पेटो को राष्ट्रभक्ति सिखाने वालों,
              भूख इंसान को गद्दार बना देती हैं|
              आरोप प्रत्यारोप नही हैं हल,
               हाथ जो थाम ले हो जाएंगे सफल|
              चमन को सीचने में पत्तियाँ कुछ झढ़ गयी होंगी,
       यही इल्ज़ाम हम पर लग रहा हैं वतन की बेवफ़ाई का,
       चमन को रौंद डाला हैं जिन्होने अपने कदमो से,
       वो अब बात करते हैं वतन की रहनूमाई का|
         

कीमती वक़्त (दो EEE विभाग के छात्रो की वार्तालाप)



रमेश : मैं हूँ रमेश और ये हें सुरेश|

सुरेश: कहने को तो हम NIT Trichy  के छात्र हैं,
            मगर सब कहते हैं की हम इंजिनियर नही,
             सिर्फ़ हँसी के पात्र हैं|

रमेश: EEE विभाग में प्रवेश लिया था 4 वर्ष पहले हमने,
           देखे ही नही पूरे भी किए बहुत से सपने|

सुरेश: खैर छोडो ये विभाग की बातें,
           पहले सुनो हमारी हास्य भरी दास्तानें|

रमेश: प्रथम वर्ष में हमे आविन बड़ा भाया,
          मात्र १० रुपये में हमने मिल्कशेक बहुत मचकाया|

सुरेश
: प्रथम वर्ष से याद आयीं आई-लब की रातें,
            जहाँ बहुत घंटे बिताए थे,
            फ़ेसबुक से लेकर ट्विटर तक
            सब के अकाउंट वही तो बनाए थे|

रमेश
: फ़ेसबुक का नाम ना लो जनाब,
          सुनकर हो जाता हैं मन बड़ा खराब|

सुरेश
: क्यो भाई, क्या हुआ?
          क्या तुम्हारा दिल भी वहाँ किसी पर फ़ना हुआ?


रमेश: कहानी कुछ ऐसी ही हैं भाई,
           सोचा था उस हरे सूट वाली को बनाएगे लुगाई,
           पर दाँव उल्टा पड़ा और हो गयी उसके मुस्टंडे भाई से पिटाई|


सुरेश: कहानी विस्तार से सूनाओ बालक,
          और अगली बार से पिटना नही,
          आज से खाना शुरू करो अंडे और पालक|

रमेश
:  तुम क्या समझोगे, तुमने कौन सी दर्द भरी रातें बिताई हैं,
           तुम्हारे स्टेटस पर तो हमेशा छप्पर फाड़ कर comment और like आई है|

सुरेश
: चलो जाने दो फ़ेसबुक को तो भाई,
          ये बताओ हरे सूट वाली के बाद,
          कभी और कोई पसंद आई?

रमेश
: पटाने की फ़ुर्सत नही मिली, पसंद तो बहुत आई,
           छोड़ेंगे नही उस नास-पीटे सी-आर को जिसने इतनी क्लास लगाई|

सुरेश
: कुछ भी कहो, उस सी-आर का नाम ना लो यार,
           दूसरे वर्ष में जिस पर दिल आया था,  वो करती थी उससे प्यार|

रमेश
: हाँ भाई, क्न्याओ की कमी हैं यार,
           स्थिति ऐसी जैसे, एक अनार सौ बीमार|

सुरेश
: अरे तुम्हे क्या किसी ने लाइब्ररी का हाल सुनाया है,
           हमने भी वहाँ गुटरगु करते जोड़ो को बहुत सताया हैं|

रमेश
: गुटरगु से याद आए,  केम्पस के कुत्ते और गाय,
         कभी हम उन्हे और कभी वो हमे दौड़ाए|

सुरेश
: दौड़ाने से याद आया, हमारे जूनियर्स का प्यार,
          याद हैं तुम्हे जब चढ़ा था तुम्हे भी रेगिंग लेने का बुखार|

रमेश
: अरे हाँ! जूनियर्स को बहुत चिकनी चमेली पे नचाया था,
           ९० से लेकर १८० तक सभी कोनो पे झुकाया था|

सुरेश: चिकनी चमेली से याद आया वो प्रोफेसर जो लड़कियों जैसे चलता था,
          जब वो अदायों से बातें करता था, उसके मुड़ते ही, पूरा क्लास उसपे हँसता था|

रमेश
: नाम ना ले उस धूर्त्ती का, उसने बहुत वॉट लगाई है,
          जिस लेब मैं जहाँ 'S' ग्रेड मिलना था, वहाँ ससुरा 'E' ग्रेड आई है|

सुरेश
: E ग्रेड से याद आया, campus का दवाखाना,
      भाई पेट दर्द हो या हो आँख फड़फड़ाई,
      इतना जान लो, मिलेगी, एक ही सर दर्द की दवाई|

रमेश
: चल मेरे भाई, पेट में चूहे कूद रहे,
          Mess पास ही हैं, क्यो ना वही चले|

सुरेश
:  Mess हम ना जायेंगे, सेहत की फ़िक्र हैं हमे,
           ना जाने राजमे की दाल में, कितनी ही बार झींगूर  पड़े मिले|

रमेश
: चल छोड़ फिर हम FEST की स्टाल पर चलते हैं,
           दुगने पैसे देकर सस्ती चना चाट आते हैं|

सुरेश
: चलते हैं अब दर्शको की इज़ाज़त लेकर,
           शुभकामनाओ के साथ ये संदेश देकर,
           रुक जाना नही कही हार के,
           हर मुश्किल से लड़ना सीना तान के|